गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

अजब से दिल के मंजर हो गये हैं


अजब से दिल के मंजर हो गये हैं
वो जाने क्यूँ सितमगर हो गये हैं

बला का शोख़ है इख़लास उसका
तभी तो हम मुतासिर हो गये हैं

जमाने में बड़े-छोटे थे हम, पर
मुहब्बत में बराबर हो गये हैं

खुदा बख़्शे हमारे दुश्मनों को
वो खुद ही बद से बदतर हो गये हैं

तिरे ख़त ने लिया जो गैर का नाम
ये दो दरिया, समंदर हो गये हैं

चलेगी उम्र कब तक साथ अपने
कि अब राही को ये डर हो गये हैं

©2019 डॉ रविन्द्र सिंह मान

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