जले दिलों को बुझे चराग़ों, उदास शामों के मौसमों में
ठिठरती रातों कसकते लम्हों के दरमियाँ जब कोई पुकारे
कोई पुकारे ए मेरे साथी किसी सफ़र पे कि साथ निकलें
कोई सफ़र जो बग़ैर रस्ते बग़ैर मंज़िल कहीं ले जाए
वहाँ ले जाए जहाँ अज़ाबों अज़ीयतों के परे न फिर से
कोई अँधेरा, कोई शिकंजा , कोई उदासी दिलों को जकड़े
भले शिकस्ता दिलों को कोई नए भरोसे नहीं दिलाए
भले हमारी घुटन का पुख़्ता इलाज कोई निकल न पाए
भले कि बेचैन धड़कनों को कोई न हाथों से थाम पाए
कोई न पूछे कि हाल क्या है कोई न हमको गले लगाए
मगर जहाँ हों गुलों के मौसम, गुलों पे रंगत बहार की हो
जहाँ पे खुशबू की आहटें हों, जहाँ पे चुप्पी खुमार की हो
हमें तो ऐसे ही मंज़रों पे बची ये उमरें गुजारनी हैं
हमें गुज़श्ता सफ़र की साथी, तमाम उलझन उतारनी है
©2026 डॉ रविंद्र सिंह मान