मंगलवार, 18 अक्तूबर 2016

जीतने को जीत का सपना जरूरी है


जीतने को जीत का सपना जरूरी है
जीत पाने के लिये लड़ना जरूरी है

आँसुओं के इस सफर में रोज जीने को
गमज़दा होकर भी पर  हँसना जरूरी है

बंजरों में फूल खिलना हो कठिन चाहे
दिल पे कोई नाम तो लिखना जरूरी है

बात कहनी भी नहीं आती मगर जिनको
बात क्यूँ उनकी पे सिर झुकना जरूरी है

आसमानों से मुझे रिश्ता निभाने को
बारिशों में दिल मिरा बहना जरूरी है

"मान" खुद में बेहतर कुछ ढूँढना है गर
आइने को सामने रखना जरूरी है



©2016 डॉ रविन्द्र सिंह मान
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सोमवार, 26 सितंबर 2016

ढूंढा करते हो मंदिर मस्जिद जिसको


चिहरे की ख़ामोशी का मतलब है क्या?
दिल के तूफानों में कुछ गफलत है क्या?

ढूंढ़ा करते हो मंदिर-मस्जिद जिसको 
उसके जैसा ही कोई भीतर है क्या

जब जब उसके होठों अपना नाम सुना
सोचा हमने पाई भी किस्मत है क्या

जिंदा रहने में परेशानी लाख सही
मरने से लेकिन कोई निस्बत है क्या

इक चेहरे पे जाने कितने चेहरे हैं
मौला! इंसानों की ये फितरत है क्या

मेड़ों की खातिर तो खेत से खेत लड़े
खेतों की अब और भी कुछ हसरत है क्या

©2016 डॉ रविन्द्र सिंह मान

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शनिवार, 24 सितंबर 2016

राहों में इस उस से धोखा खा बैठे

राहों में इस उस से धोखा खा बैठे
चलते-चलते पत्थर से टकरा बैठे

उनको सिज्दा करके, ऐसा लगता है

दिल का पारा, शीशे में उलझा बैठे

उसने जब भी चाहा रुसवा कर डाला

सीने का गम ये किसको बतला बैठे

वो मौसम से पहले बदला, जिस खातिर

हम जीने-मरने की कसम उठा बैठे

जीवन के दरिया में बहते-बहते सब

साहिल से मिलने की शर्त लगा बैठे



©2016 डॉ रविन्द्र सिंह मान
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सोमवार, 19 सितंबर 2016

हमें मुहब्बत की चाहते हैं

कभी किनारे निहारते हैं
कभी समन्दर पुकारते हैं

हमीं, दिलों को उधार देकर
उदास रातें गुजारते हैं

कुछेक उनके यकीन सच्चे
कुछेक उनको मुग़ालते हैं

अभी बहारों में देर है कुछ
अभी से क्या, आप चाहते हैं?

उदास दिल हैं, उदास बातें
उदासियाँ ही इबादते हैं

बहार, पतझड़ से डर गई, याँ
ये जिन्दगी की शरारते हैं

कशम कशी के तमाम मौके 
न जीत पाते, न हारते हैं

तमाम चेहरों पे दाग़ दिल के
मुहब्बतों में हिकारते हैं

तुमे मुबारक जहाँ की दौलत
हमें मुहब्बत की चाहते हैं





©2016 डॉ रविन्द्र सिंह मान
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शनिवार, 17 सितंबर 2016

खुशी बाँटा किये, गम को पिया है




खुशी बाँटा किये, गम को पिया है
तुम्हारी उल्फतों को यूँ जिया है

किसी का दर्द हो लेते हैं खुद पर 
मुहब्बत ने यही सिखला दिया है

दिनों से रात काली, लाख अच्छी
न अश्कों से किसी को वास्ता है

अरे! ये कौन सायों की अदा में
बिना बोले हमें पुचकारता है

हमारे वक्त पे कैसी घड़ी है
अदावत दोस्ती का रास्ता है

बराबर धड़कनों  में नाम तेरा
हमें दिन-रात अक्सर टोकता है

हवाओं में है खुशबू बारिशों की
मिरे मन में कसैला सा ये क्या है

खुशी फैली हुई चारों तरफ थी
दुखों को ही मगर हमने चुना है

©2016 डॉ रविन्द्र सिंह मान

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मंगलवार, 6 सितंबर 2016

हमें अपनी लकीरें खुद बदलना भी जरूरी है

मुक़द्दर के समन्दर से निकलना भी जरूरी है
हमें अपनी लक़ीरें खुद बदलना भी जरूरी है

मिरा हक था कि अपने प्रेम को साबित करूँ पहले
तिरी ज़ुल्फ़ों का उसके बाद ढलना भी जरूरी है

खफा जब दौर था हमसे, जलाये दिल-जिगर ऐसे
मुकाबिल आँधियों के दीप जलना भी जरूरी है

शिकायत औ गिले-शिकवे पुराने ढंग उल्फ़त के
जरा सी बात पे क्या खूँ उबलना भी जरूरी है

कहीं घूँघट, कहीं बुरका गुलामी का तरीका है
इसे इतराज के परचम में ढलना भी जरूरी है


नया उत्सव है आज़ादी, नया इखलाक आइन है 
पुराने सब ख़ुदाओं को बदलना भी जरूरी है


©2015 डॉ रविन्द्र सिंह मान

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सोमवार, 5 सितंबर 2016

धड़कनों से क्या शिकायत दोस्तो

वक्त की  है ये  सदाकत दोस्तो
आ गया दौरे-खिलाफत दोस्तो

सुन दिये की इल्तिजा, सरकश हवा
कर रही फिर से सियासत दोस्तो

दाँव अपना सर लगाया, हर दफे
पर हुई, फिर से हजामत दोस्तो

दोस्ती जब दिल से है, तो रात भर
धड़कनों से क्या शिकायत दोस्तो

टीस दिल की औ शबों की तीरगी
आपकी ही है  इनायत दोस्तो

आज भूले से इधर आये तो हैं
क्या उन्हें भी है नदामत दोस्तो



©2015 डॉ रविन्द्र सिंह मान
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