शुक्रवार, 21 अगस्त 2015

रंग भरने को पर आसमाँ चाहिये

बेवफा जिंदगी को वफ़ा चाहिये
आसरा चाहिये इक सदा चाहिये

भूलके रास्ता खो चुके हैं निशाँ

देश को फिर नया रहनुमा चाहिये

जिंदगी और भी आशिकी से परे

बेवजह चाहिये खुशनुमा चाहिये

बेसबब आज रोये सरे राह हम

आँसुओं का जरा हौंसला चाहिये

दिल सहम ही गया आपने जब कहा

सामने से हटो रास्ता चाहिये

राहतों के अभी कुछ ठिकाने नहीं

चाहतें बेशुमार इंतिहा चाहिये

वे पड़ोसी हुये अब सदा को मिरे

दोस्ती का नया सिलसिला चाहिये

बात दिल की कहूँ बेजुबां न रहूँ

रंग भरने को पर आसमाँ चाहिये

आस तुमसे रही, बात दिल की कही

ये खता हो गई तो सजा चाहिये


©2015 डॉ रविन्द्र सिंह मान
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बुधवार, 19 अगस्त 2015

दिल मेरा पत्थर नहीं है

आ कि मेरी धड़कनों में बस तुम्हारा नाम है
जिंदगी नेमत तिरी है औ तिरी पहचान है

तुम जिसे इस पार से उस पार तक खींचा किये

दिल मेरा पत्थर नहीं है इक जरा सी जान है

सख्त दिखना, सख्त रहना है तकाजा वक्त का

छू लिया, पाओगे भीतर मोम सा इंसान है 

सेहरी औ रोजे' की अफ्तार तक मुश्किल नहीं

मुफलिसों के वास्ते ताजिंदगी रमजान है

आज फिर मैं भीड़ में ढूंढा किया खुद को यहाँ

हाशिया मेरी हकीकत, तन्हाई पहचान है

झूठ उतरा आईने में औ हकीकत ये खुली

शायरी है दिल मेरा, सिर कुफ़्र का सामान है



©2015 डॉ रविन्द्र सिंह मान
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मंगलवार, 18 अगस्त 2015

रह गई आपकी ही कमी दोस्तों

जान दी, दी उसी की हुई दोस्तों
रह गई इश्क की बंदगी दोस्तों

मैं चला, मंजिलों की तरह जिंदगी
दूर से दूर होती गई दोस्तों

काम था, नाम था, था सभी कुछ यहाँ
रह गई आप की ही कमी दोस्तों

हम रहेंगे नहीं, पर रहें इश्क की
आयतें जो हवा में लिखी दोस्तों

छोड़के तेरा' दर हम हुये दर बदर
है कहानी पुरानी वही दोस्तों

यूँ उतारी नजर, की नजर से उतर
हम गये, बस कमी ये रही दोस्तों

रात भर ये हवा गुनगुनाती रही
आपकी याद आती रही दोस्तों

जो तहें जिस्म की ही रहे खोलते
फिर कहाँ प्यास उनकी बुझी दोस्तों

हाथ भर था सफर, हाथ से ही निकल
तुम गये, तो गई जिंदगी दोस्तों


©2015 डॉ रविन्द्र सिंह मान
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शनिवार, 8 अगस्त 2015

तुम्हारे बिन न होंगे दिन हँसी के

रहे घर के न तेरी ही गली के
वही हैं हाल अब भी आशिकी के

कभी देखा जिसे परखा नहीं था
कहाँ कायल हुआ ऐसी खुदी के

बहारें लौट कर आती रहेंगी
तुम्हारे बिन न होंगे दिन हँसी के

इश्क में नेकनामी से भी बढ़कर
मिली नाकामियाँ, तमगे ख़ुशी के

वफ़ा उनकी न परखो यूँ अभी से
तरीके और भी हैं ख़ुदकुशी के

मिरे गम का नहीं इल्जाम तुझ पर
न मेरे आँसुओं में गम किसी के

बहुत खामोश हो फिर आज, शायद
यकीं तुमको था बातों पे उसी के

कभी भीतर उतर के ही न देखा
तुम्हारी मुस्कराहट, बेबसी के



©2015 डॉ रविन्द्र सिंह मान
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