बुधवार, 26 दिसंबर 2018

हर कोई लगता है अब देखा हुआ



जो रहा खुद आप में सिमटा हुआ
वो जहां में आज तक किसका हुआ

जिससे पूछो बस यही शिक़वा उसे
दिल लगाने में बड़ा हर्जा हुआ

बस्तियाँ उजड़ी हैं जैसे गाँव की
दिल का भी अपने यही किस्सा हुआ

रात भर कुछ बेक़रारी सी रही
ख़ाब में था चाँद भी बिखरा हुआ

वो चला जायेगा इक़ दिन बेवज़ह,
डर यही था, आखिरत सच्चा हुआ

आपको देखा तो इत्मीनान है
हर कोई लगता है अब देखा हुआ

कुछ तो आती थी उसे जादूगरी
जो मिला उससे, वही उसका हुआ

सोचता हूँ अलविदा के वक़्त भी
इश्क़ का क्यूँ खामखां चर्चा हुआ

बागवाँ है या कोई सय्याद है
हर परिंदा है डरा-सहमा हुआ

अब यकीं आए किसी पर, किस तरह
वो मिरा हो कर नहीं मेरा हुआ


©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान


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शनिवार, 22 दिसंबर 2018

क्या करूँ



जब सितम करना ही हो उन की इनायत, क्या करूँ
दिल दिया, तो जान लेने की शिकायत क्या करूँ

रोज़ दिलवाता तो होगा उसको सूरज मेरी याद
भूलने की हो किसी को ग़रचे आदत, क्या करूँ

खूबसूरत हो गई है शाम उनके नाम से
रात भर होगी तसव्वुर की अज़ीयत क्या करूँ

ख़ाब में देखा है दिल ने जब से उसको, आज तक
माँगता है रात-दिन उसकी रफ़ाक़त, क्या करुँ

मैं चला था मंजिलों के वास्ते, पर राह में
हो गई राहों से ही मुझको मुहब्बत क्या करूँ

दिख रहा है अक्स उसका अपने चिहरे की जगह
आइना भी कर रहा है अब सियासत, क्या करूँ

मौसमों की बेरुखी के बाद भी खिल जाए गुल
इस नफ़ासत से करे कोई बग़ावत, क्या करूँ

जब मिरा क़ातिल ही, मुंसिफ़ तय किया है आपने
मेरे हक़ में फ़ैसले की फिर वकालत क्या करूँ

काफ़िये, मिसरे, रदीफों ने किया मुझको तबाह
शायरी की मुझको ऐसी हो गई लत क्या करूँ

दाग दिल के चेहरों पर दिख ने लगे हैं हर तरफ़  
उस क़यामत से है पहले, यह क़यामत क्या करूँ

कुछ तुजुर्बे हार के और कुछ हसीनाओं के खत
मुख्तसर सी इस खजाने की है दौलत, क्या करूँ

ग़ैर की बाहों में भूले से मिरा लेता है नाम
अब उसे मुझसे है गर इतनी मुहब्बत क्या करूँ

©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान


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गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

ऐसा भी हो सकता है


भूख-बेकारी, इक़ नारा हो, ऐसा भी हो सकता है
"सबकी तरक्क़ी" बस वादा हो, ऐसा भी हो सकता है

तुम मंदिर-मस्ज़िद बाँटो हो, पर इस देश के लोगों ने,
रोटी, कपड़ा, घर चाहा हो, ऐसा भी हो सकता है

वो सच में दरवेश रहा हो, ऐसा भी हो सकता है
या फिर काफ़िर मुझ जैसा हो, ऐसा भी हो सकता है

मंदिर-मस्जिद तोड़ने वालो, बैठो, बैठ के सोचो तो
जो ईश्वर है वही खुदा हो, ऐसा भी हो सकता है

जान बचाने का कहकर ही, काट रहा है डॉक्टर पेट
लालच उस को काट रहा हो, ऐसा भी हो सकता है

लिए कुदालें, हँसिये, जो सदियों से खोद रहा धरती
वही जहाँ का असल खुदा हो, ऐसा भी हो सकता है

दस्तक़ सुन कर मैं भी चौंका, और दिल भी मुँह को आया
दरवाज़े पर सिर्फ़ हवा हो, ऐसा भी हो सकता है

©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान


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गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

ऐसा भी हो सकता है


भूख-बेकारी, इक़ नारा हो, ऐसा भी हो सकता है
"सबकी तरक्क़ी" बस वादा हो, ऐसा भी हो सकता है

तुम मंदिर-मस्ज़िद बाँटो हो, पर इस देश के लोगों ने,
रोटी, कपड़ा, घर चाहा हो, ऐसा भी हो सकता है

वो सच में दरवेश रहा हो, ऐसा भी हो सकता है
या फिर काफ़िर मुझ जैसा हो, ऐसा भी हो सकता है

मंदिर-मस्जिद तोड़ने वालो, बैठो, बैठ के सोचो तो
जो ईश्वर है वही खुदा हो, ऐसा भी हो सकता है

लिए कुदालें, हँसिये, जो सदियों से खोद रहा धरती
वही जहाँ का असल खुदा हो, ऐसा भी हो सकता है

दस्तक़ सुन कर मैं भी चौंका, और दिल भी मुँह को आया
दरवाज़े पर सिर्फ़ हवा हो, ऐसा भी हो सकता है

©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान


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