शनिवार, 8 अगस्त 2015

तुम्हारे बिन न होंगे दिन हँसी के

रहे घर के न तेरी ही गली के
वही हैं हाल अब भी आशिकी के

कभी देखा जिसे परखा नहीं था
कहाँ कायल हुआ ऐसी खुदी के

बहारें लौट कर आती रहेंगी
तुम्हारे बिन न होंगे दिन हँसी के

इश्क में नेकनामी से भी बढ़कर
मिली नाकामियाँ, तमगे ख़ुशी के

वफ़ा उनकी न परखो यूँ अभी से
तरीके और भी हैं ख़ुदकुशी के

मिरे गम का नहीं इल्जाम तुझ पर
न मेरे आँसुओं में गम किसी के

बहुत खामोश हो फिर आज, शायद
यकीं तुमको था बातों पे उसी के

कभी भीतर उतर के ही न देखा
तुम्हारी मुस्कराहट, बेबसी के



©2015 डॉ रविन्द्र सिंह मान
 सर्वाधिकार सुरक्षित

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें