शनिवार, 22 दिसंबर 2018

क्या करूँ



जब सितम करना ही हो उन की इनायत, क्या करूँ
दिल दिया, तो जान लेने की शिकायत क्या करूँ

रोज़ दिलवाता तो होगा उसको सूरज मेरी याद
भूलने की हो किसी को ग़रचे आदत, क्या करूँ

खूबसूरत हो गई है शाम उनके नाम से
रात भर होगी तसव्वुर की अज़ीयत क्या करूँ

ख़ाब में देखा है दिल ने जब से उसको, आज तक
माँगता है रात-दिन उसकी रफ़ाक़त, क्या करुँ

मैं चला था मंजिलों के वास्ते, पर राह में
हो गई राहों से ही मुझको मुहब्बत क्या करूँ

दिख रहा है अक्स उसका अपने चिहरे की जगह
आइना भी कर रहा है अब सियासत, क्या करूँ

मौसमों की बेरुखी के बाद भी खिल जाए गुल
इस नफ़ासत से करे कोई बग़ावत, क्या करूँ

जब मिरा क़ातिल ही, मुंसिफ़ तय किया है आपने
मेरे हक़ में फ़ैसले की फिर वकालत क्या करूँ

काफ़िये, मिसरे, रदीफों ने किया मुझको तबाह
शायरी की मुझको ऐसी हो गई लत क्या करूँ

दाग दिल के चेहरों पर दिख ने लगे हैं हर तरफ़  
उस क़यामत से है पहले, यह क़यामत क्या करूँ

कुछ तुजुर्बे हार के और कुछ हसीनाओं के खत
मुख्तसर सी इस खजाने की है दौलत, क्या करूँ

ग़ैर की बाहों में भूले से मिरा लेता है नाम
अब उसे मुझसे है गर इतनी मुहब्बत क्या करूँ

©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान


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