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शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019

गुनाह बाद जो तस्लीम भी करे उसकी


जहाँ तो जान चुका मुझ को तेरी आदत है
कभी तुझे भी बताऊँ कि कैसी चाहत है

मुझी से पूछ रहे हो वफ़ा के अर्थ, कहो
कि इश्क़ तुम जिसे कहते हो क्या सियासत है

किसी ने संग गिराये, ज़हर किसी ने दिया
वो फूल तुमने जो फेंके, वही अदावत है

ख़ुदा ने इश्क़ बनाया, जहाँ ने ज़ख्म दिये
दिलों ने कुफ़्र कमाया, यही बग़ावत है

वो चाहता है, नहीं मानता मग़र फिर भी
यही ज़ुल्मत है वज़ाहत है औ कयामत है

रहे न घर के न बाहर के, दैर के, फिर भी
ये किस तरह से बताते हो सब सलामत है

तुझी से तुझ को चुरालूँ, दिलों में जड़वा लूँ
मैं तुम से पूछ रहा हूँ कि क्या इजाज़त है

गुनाह बाद जो तस्लीम भी करे उसकी
है एक इश्क़ ही, जिसमें कि ये रिवायत है

©2019 डॉ रविन्द्र सिंह मान

मंगलवार, 10 दिसंबर 2019

क्या उसे इतना चाहता हूँ मैं


आपसे मिलने की दुआ हूँ मैं
आरजू, ख़ाब का सिला हूँ मैं

दूर तक बेबसी है राहों में
चाहे जिस ओर भी चला हूँ मैं

आज सहरा हूँ क़ल समंदर था
जाने किस ज़ुर्म की सज़ा हूँ मैं

उम्र से क्या गिला करें यारो
मौत की राह में खड़ा हूँ मैं

जिसको देखूँ वही नज़र आए
क्या उसे इतना चाहता हूँ मैं

जिंदगी मुझको पी रही है यूँ
जाम कोई भरा हुआ हूँ मैं

©2019 डॉ रविन्द्र सिंह मान

बुधवार, 2 अक्टूबर 2019

जाने किसके हाथ है जश्न सदारत का


जाने किसके हाथ है जश्न सदारत का
काँप  रहा गोशा  हर एक इमारत का

तुम ने जो तजवीज़ किया हाकिम हमको
उन पे तो इल्ज़ाम है क़त्ल-ओ-ग़ारत का

जब तक निर्धन के तन कपड़ा बाकी है
बचा रहेगा तब तक काम तिज़ारत का

बाग़ उजाड़े ख़ुद  सत्ता  के  हाथों  ने
और हवाओं  पर इल्ज़ाम  शरारत का

लिक्खेंगे हम जुल्म-सितम की सच्चाई
बाकी जब तक खूं में असर हरारत का



©2019 डॉ रविन्द्र सिंह मान

रविवार, 15 सितंबर 2019

ऐसे भी बदले की आग बुझाई हमने



ऐसे  भी  बदले की आग  बुझाई हमने
इसकी शामें, उसके साथ बिताई हमने

रिश्ते तोड़ के जब भी चाहो जा सकते हो
तुमको अपनी कसमें  कब दिलवाई हमने

उल्फ़त में भी सब कुछ क़िस्मत से मिलता है
तुमने   दुनिया  पाई  औऱ  तन्हाई  हमने

तेरे ग़म को चुप करवाकर, अपनी आँखें
जाने  किसके  ग़म  में  रात जलाई हमने

सचमुच उसके  बाद  सुकूँ से जीता हूँ मैं
अक़्सर दिल को बात यही समझाई हमने

बहरे सन्नाटे तक  सुन कर  सहम गए थे
तेरी चुप को जब आवाज लगाई हमने

लाख हमारे घर तक दरिया आएं- जाएं
ख़ुद अपने से अपनी प्यास छुपाई हमने



©2019 डॉ रविन्द्र सिंह मान

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बुधवार, 21 अगस्त 2019

दुःख तो ये है

दुःख तो ये है वो शामिल हैं मेरा शहर जलाने में
मैंने अपने हाथ जलाए जिनकी आग बुझाने में

यादों को धुँधला करने में, नजरें भी धुंधलाऐंगी,
वक़्त लगेगा दीवारों पर लिक्खे नाम मिटाने में

कुछ कहने से पहले रुककर लाख अगर सोचा फिर भी,
और भी दिल के भेद खुले हैं, दिल का राज छुपाने में

जीवन के शतरंज़ पे आख़िर वक्त ने ऐसी चाल चली
ग़ैर तो  ग़ैर रहे, अपने भी  ग़ैर हुए अनजाने में

कुछ तो उन नीली आँखों में दरियाओं का वादा था
और कुछ लज्ज़त, जिस्मों को भी, डूब के थी मर जाने में

दिल चाहे मंदिर के अंदर खुल जाये इक़ मस्ज़िद भी
और इस मस्ज़िद का इक़ पहलू खुल जाए मयख़ाने में

रोज मरीजों से कहता हूँ ऐसे समझाओ दिल को
लेक़िन ख़ुद को उम्र लगी है, इस दिल को समझाने में

©2019 डॉ रविन्द्र सिंह मान

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गुरुवार, 14 मार्च 2019

कभी जो किसी ने मुहब्बत लिखी है

कभी जो किसी ने मुहब्बत लिखी है
ज़माने ने कितनी अज़ीयत लिखी है

हमारे मुक़द्दर में मानो न मानो
मुहब्बत लिखी है बग़ावत लिखी है

जिसे देख लूँ फेर लेता है आँखें,
मिरे मुँह पे ऐसी सदाक़त लिखी है

खतों के सहारे भी जीती है दुनिया
मग़र आपने तो अदावत लिखी है

हवाओं में थोड़ी नमी है, ये हमने
निगाहों से तेरी इबादत लिखी है

अगर उनको चुभने लगी हैं ये बातें
तो सच जानिए सब हक़ीकत लिखी है


©2019 डॉ रविन्द्र सिंह मान




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सोमवार, 11 फ़रवरी 2019

तुम होते तो

तुम होते तो सारे मौसम सावन होते
सारी गलियाँ, सारे रस्ते पावन होते

टिम-टिम करती रातों के मद्धम सन्नाटे

तुम मानो या न मानो, मनभावन होते
तितली सी उड़ती-फिरती तुम कुछ-कुछ कहतीं
हम आतुर फूलों का सा अभिवादन होते

तुम होते तो जाहिर है फिर तुम ही होते

चाँद, सितारे, सावन, भादों गुम ही होते

तुम होते तो राहें खुद चल-चल कर आतीं

तुम होते तो मंजिल मुझ को आप बुलातीं
तुम होते तो पग-पग खुशियाँ नाच दिखातीं
तुम होते तो घड़ियाँ पूछ के आती-जातीं

तुम होते तो फूल इजाजत लेकर खिलते

हम से पूछ के मौसम अपने रंग बदलते

तुम होते तो चाँद चाँदनी पर झल्लाता

सूरज हमसे आँख मिलाते भी शर्माता
तुम होते तो जाड़ा तो शरमा ही जाता
पतझड़ तुमको देखके बस घबरा ही जाता

तुम होते तो घिर-घिर फ़ागुन रोज ही आते

मौज-मस्तियाँ भी जीवन के ऐसे होते
तेरे बिन खुशियाँ भी सारी गम जैसी हैं
तुम होते तो गम भी खुशियों जैसे होते

©2019 डॉ रविन्द्र सिंह मान



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गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

अजब से दिल के मंजर हो गये हैं


अजब से दिल के मंजर हो गये हैं
वो जाने क्यूँ सितमगर हो गये हैं

बला का शोख़ है इख़लास उसका
तभी तो हम मुतासिर हो गये हैं

जमाने में बड़े-छोटे थे हम, पर
मुहब्बत में बराबर हो गये हैं

खुदा बख़्शे हमारे दुश्मनों को
वो खुद ही बद से बदतर हो गये हैं

तिरे ख़त ने लिया जो गैर का नाम
ये दो दरिया, समंदर हो गये हैं

चलेगी उम्र कब तक साथ अपने
कि अब राही को ये डर हो गये हैं

©2019 डॉ रविन्द्र सिंह मान

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शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

अभी कुछ और शामें हैं खुशी की

ग़जल

मुहब्बत में भी उसने दिल्लगी की
जहर देकर दुआ दी जिंदगी की

सन्नाटों में जो अक्सर गूँजती है
सदा है ये हमारी ख़ामुशी की

गुजारें वक़्त कैसे साथ अपने
कि आदत हो गई हमको किसी की

नहीं भूले तुम्हारा नाम, यानी
अभी कुछ और शामें हैं खुशी की

किसी का नाम लूँ, तू याद आये
हदें तो कर मुकर्रर बंदगी की

दगा देकर, ज़माने में सभी को
दुहाई दे रहा है दोस्ती की

©2019 डॉ रविन्द्र सिंह मान

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गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

ऐसा भी हो सकता है


भूख-बेकारी, इक़ नारा हो, ऐसा भी हो सकता है
"सबकी तरक्क़ी" बस वादा हो, ऐसा भी हो सकता है

तुम मंदिर-मस्ज़िद बाँटो हो, पर इस देश के लोगों ने,
रोटी, कपड़ा, घर चाहा हो, ऐसा भी हो सकता है

वो सच में दरवेश रहा हो, ऐसा भी हो सकता है
या फिर काफ़िर मुझ जैसा हो, ऐसा भी हो सकता है

मंदिर-मस्जिद तोड़ने वालो, बैठो, बैठ के सोचो तो
जो ईश्वर है वही खुदा हो, ऐसा भी हो सकता है

लिए कुदालें, हँसिये, जो सदियों से खोद रहा धरती
वही जहाँ का असल खुदा हो, ऐसा भी हो सकता है

दस्तक़ सुन कर मैं भी चौंका, और दिल भी मुँह को आया
दरवाज़े पर सिर्फ़ हवा हो, ऐसा भी हो सकता है

©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान


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