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रविवार, 8 सितंबर 2019

हिज्र की रात मुक़द्दर से सितारे निकले



हिज्र की रात  मुक़द्दर से सितारे निकले
राह  में  टूटे   हुए  ख़ाब  हमारे  निकले

ग़ैर  ने   छूके   मुझे  हाथ  जलाए  अपने
राख समझा था जिसे सुर्ख अँगारे निकले

जब अकेले में तलाशी हुई दिल की अपने
मेरे अंदर से  सभी अक्स तुम्हारे निकले

इश्क तो  सिर्फ़  तमाशा था शनासाई का
रक़्स  करते  हुए सब लोग बंजारे निकले

उम्र भर दिल को डराते रहे तन्हाई-ओ-ग़म
यार माना तो ये दिलबर से भी प्यारे निकले

कुछ  मुक़द्दर के तमाशे  भी थे बर्बादी में,
बेशतर अपने  रफ़ीकों के  इशारे निकले

©2019 डॉ रविन्द्र सिंह मान

 सर्वाधिकार सुरक्षित

गुरुवार, 14 मार्च 2019

कभी जो किसी ने मुहब्बत लिखी है

कभी जो किसी ने मुहब्बत लिखी है
ज़माने ने कितनी अज़ीयत लिखी है

हमारे मुक़द्दर में मानो न मानो
मुहब्बत लिखी है बग़ावत लिखी है

जिसे देख लूँ फेर लेता है आँखें,
मिरे मुँह पे ऐसी सदाक़त लिखी है

खतों के सहारे भी जीती है दुनिया
मग़र आपने तो अदावत लिखी है

हवाओं में थोड़ी नमी है, ये हमने
निगाहों से तेरी इबादत लिखी है

अगर उनको चुभने लगी हैं ये बातें
तो सच जानिए सब हक़ीकत लिखी है


©2019 डॉ रविन्द्र सिंह मान




 सर्वाधिकार सुरक्षित

बुधवार, 6 फ़रवरी 2019

अब उजालों का काफिला अपना

है मुसाफत पे आसरा अपना
मंजिलों से है वायदा अपना

तीरगी  की मियाद इतनी थी
अब उजालों का काफिला अपना

आज भी भूख की हुकूमत पर
खून रह-रह के खौलता अपना

मुश्किलों को जबाव देता है
सब्र, संघर्ष, हौंसला अपना

लाख हो दिल उदास पर देखो
आज चिहरा खिला-खिला अपना

दर्द सबका शुमार है इसमें
इसलिए है ये दिल भरा अपना

अश्क़ दे कर भी फूल खिल न सके
सिर्फ इतना है वाकया अपना

कौन आता है रोज दुनिया में
नाम, कुछ कर, कि हो जुदा अपना

झूठ है ग़म की बानगी सारी
ख़ूब हँसता है आइना अपना

आप ने तोड़ कर बुरा न किया
दिल तो टूटा है बारहा अपना

जिंदगी क्या इसी को कहते हैं
दिल भी अपना न दिलरुबा अपना

बारिशों पर मलाल इतना है
मिट गया अब के झौंपड़ा अपना

©2019 डॉ रविन्द्र सिंह मान

 सर्वाधिकार सुरक्षित

शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

अभी कुछ और शामें हैं खुशी की

ग़जल

मुहब्बत में भी उसने दिल्लगी की
जहर देकर दुआ दी जिंदगी की

सन्नाटों में जो अक्सर गूँजती है
सदा है ये हमारी ख़ामुशी की

गुजारें वक़्त कैसे साथ अपने
कि आदत हो गई हमको किसी की

नहीं भूले तुम्हारा नाम, यानी
अभी कुछ और शामें हैं खुशी की

किसी का नाम लूँ, तू याद आये
हदें तो कर मुकर्रर बंदगी की

दगा देकर, ज़माने में सभी को
दुहाई दे रहा है दोस्ती की

©2019 डॉ रविन्द्र सिंह मान

 सर्वाधिकार सुरक्षित

बुधवार, 26 दिसंबर 2018

हर कोई लगता है अब देखा हुआ



जो रहा खुद आप में सिमटा हुआ
वो जहां में आज तक किसका हुआ

जिससे पूछो बस यही शिक़वा उसे
दिल लगाने में बड़ा हर्जा हुआ

बस्तियाँ उजड़ी हैं जैसे गाँव की
दिल का भी अपने यही किस्सा हुआ

रात भर कुछ बेक़रारी सी रही
ख़ाब में था चाँद भी बिखरा हुआ

वो चला जायेगा इक़ दिन बेवज़ह,
डर यही था, आखिरत सच्चा हुआ

आपको देखा तो इत्मीनान है
हर कोई लगता है अब देखा हुआ

कुछ तो आती थी उसे जादूगरी
जो मिला उससे, वही उसका हुआ

सोचता हूँ अलविदा के वक़्त भी
इश्क़ का क्यूँ खामखां चर्चा हुआ

बागवाँ है या कोई सय्याद है
हर परिंदा है डरा-सहमा हुआ

अब यकीं आए किसी पर, किस तरह
वो मिरा हो कर नहीं मेरा हुआ


©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान


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शनिवार, 22 दिसंबर 2018

क्या करूँ



जब सितम करना ही हो उन की इनायत, क्या करूँ
दिल दिया, तो जान लेने की शिकायत क्या करूँ

रोज़ दिलवाता तो होगा उसको सूरज मेरी याद
भूलने की हो किसी को ग़रचे आदत, क्या करूँ

खूबसूरत हो गई है शाम उनके नाम से
रात भर होगी तसव्वुर की अज़ीयत क्या करूँ

ख़ाब में देखा है दिल ने जब से उसको, आज तक
माँगता है रात-दिन उसकी रफ़ाक़त, क्या करुँ

मैं चला था मंजिलों के वास्ते, पर राह में
हो गई राहों से ही मुझको मुहब्बत क्या करूँ

दिख रहा है अक्स उसका अपने चिहरे की जगह
आइना भी कर रहा है अब सियासत, क्या करूँ

मौसमों की बेरुखी के बाद भी खिल जाए गुल
इस नफ़ासत से करे कोई बग़ावत, क्या करूँ

जब मिरा क़ातिल ही, मुंसिफ़ तय किया है आपने
मेरे हक़ में फ़ैसले की फिर वकालत क्या करूँ

काफ़िये, मिसरे, रदीफों ने किया मुझको तबाह
शायरी की मुझको ऐसी हो गई लत क्या करूँ

दाग दिल के चेहरों पर दिख ने लगे हैं हर तरफ़  
उस क़यामत से है पहले, यह क़यामत क्या करूँ

कुछ तुजुर्बे हार के और कुछ हसीनाओं के खत
मुख्तसर सी इस खजाने की है दौलत, क्या करूँ

ग़ैर की बाहों में भूले से मिरा लेता है नाम
अब उसे मुझसे है गर इतनी मुहब्बत क्या करूँ

©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान


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गुरुवार, 20 दिसंबर 2018

ऐसा भी हो सकता है


भूख-बेकारी, इक़ नारा हो, ऐसा भी हो सकता है
"सबकी तरक्क़ी" बस वादा हो, ऐसा भी हो सकता है

तुम मंदिर-मस्ज़िद बाँटो हो, पर इस देश के लोगों ने,
रोटी, कपड़ा, घर चाहा हो, ऐसा भी हो सकता है

वो सच में दरवेश रहा हो, ऐसा भी हो सकता है
या फिर काफ़िर मुझ जैसा हो, ऐसा भी हो सकता है

मंदिर-मस्जिद तोड़ने वालो, बैठो, बैठ के सोचो तो
जो ईश्वर है वही खुदा हो, ऐसा भी हो सकता है

जान बचाने का कहकर ही, काट रहा है डॉक्टर पेट
लालच उस को काट रहा हो, ऐसा भी हो सकता है

लिए कुदालें, हँसिये, जो सदियों से खोद रहा धरती
वही जहाँ का असल खुदा हो, ऐसा भी हो सकता है

दस्तक़ सुन कर मैं भी चौंका, और दिल भी मुँह को आया
दरवाज़े पर सिर्फ़ हवा हो, ऐसा भी हो सकता है

©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान


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गुरुवार, 13 दिसंबर 2018

ऐसा भी हो सकता है


भूख-बेकारी, इक़ नारा हो, ऐसा भी हो सकता है
"सबकी तरक्क़ी" बस वादा हो, ऐसा भी हो सकता है

तुम मंदिर-मस्ज़िद बाँटो हो, पर इस देश के लोगों ने,
रोटी, कपड़ा, घर चाहा हो, ऐसा भी हो सकता है

वो सच में दरवेश रहा हो, ऐसा भी हो सकता है
या फिर काफ़िर मुझ जैसा हो, ऐसा भी हो सकता है

मंदिर-मस्जिद तोड़ने वालो, बैठो, बैठ के सोचो तो
जो ईश्वर है वही खुदा हो, ऐसा भी हो सकता है

लिए कुदालें, हँसिये, जो सदियों से खोद रहा धरती
वही जहाँ का असल खुदा हो, ऐसा भी हो सकता है

दस्तक़ सुन कर मैं भी चौंका, और दिल भी मुँह को आया
दरवाज़े पर सिर्फ़ हवा हो, ऐसा भी हो सकता है

©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान


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गुरुवार, 29 नवंबर 2018

है तुम्हें इस बात पर इतनी हैरानी किस लिए



जब हक़ीकत दुखभरी हो शादमानी किस लिए
सच छुपाना ठीक, पर झूठी कहानी किस लिए

रोज़ ही जीने की खातिर मर रहा हूँ आज़कल
जिंदगी है तू मिरी दुश्मन पुरानी किस लिए

नम निगाहों पर मिरी भी, नाम क्यूँ तेरा नहीं
है तुम्हें इस बात पर इतनी हैरानी किस लिए

आप ही मैं तज़किरा करता हूँ अक्सर आप से
लाख उनसे दुश्मनी पर बदजुबानी किस लिए

जिंदगी दरिया थी, जिसमें इश्क के तूफान थे
वक़्त भी हम पर दिखाता मेह्रबानी किस लिए

साहिलों से सीख देते दोस्तों को क्या कहें
क्या छुपा है दिल के अंदर, बेजुबानी किस लिए

ख़ाक हो जाने हैं आख़िर, जब सितारे अर्श के
जिंदगी होती है फिर इतनी सुहानी किस लिए

अब अगर तुमको पलट कर देखने से है गुरेज़
लौट कर मुझ पे भी फिर आये जवानी किस लिए

याद आयेगी कभी तो, लौट आएगा वो शख्स
बस इसी उम्मीद पर है जिंदगानी किस लिए

यार की तौहीन से बढ़कर नहीं तौहीन कुछ

ये भी है मंजूर तो फिर सरगिरानी किस लिए



©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान



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मंगलवार, 27 नवंबर 2018

कभी तुझे भी बताऊँ कि कैसी चाहत है



जहाँ तो जान चुका मुझ को तेरी आदत है
कभी तुझे भी बताऊँ कि कैसी चाहत है

मुझी से पूछ रहे हो वफ़ा के अर्थ, कहो
कि इश्क़ तुम जिसे कहते हो वो सियासत है

किसी ने संग गिराये, ज़हर किसी ने दिया
वो फूल तुमने जो फेंके, वही अदावत है

ख़ुदा ने इश्क़ बनाया, जहाँ ने ज़ख्म दिये
दिलों ने कुफ़्र कमाया, यही बग़ावत है

वो चाहता है, नहीं मानता मग़र फिर भी
यही ज़ुल्मत है वज़ाहत है औ कयामत है

रहे न घर के न बाहर के, दैर के, फिर भी
ये किस तरह से बताते हो सब सलामत है

तुझी से तुझ को चुरालूँ, दिलों में जड़वा लूँ
मैं तुम से पूछ रहा हूँ कि क्या इजाज़त है

गुनाह बाद जो तस्लीम भी करे उसकी
है इश्क़ जुर्म वो जिसमें कि ये रिवायत है

मुझे कहा कि मिलो तुम कभी तन्हाई में
ये उसका मुझ पे करम है कि कुछ हिदायत है

चले तो हम भी लेके कारवाँ चिरागों का
हयात-ए- तीरगी तूफ़ान की इनायत है

किसी को चाँद, किसी को उफ़क से इश्क़ रहे
हमें तो अब भी मग़र आपकी जरूरत है

किसी ने फिर से अगर दिल के दर पे दस्तक दी
मिरा जबाव रहेगा, कि फिर स्वागत है

©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान

 सर्वाधिकार सुरक्षित

शुक्रवार, 23 नवंबर 2018

तुम्हारी उल्फ़त में मैंने देखा



तुम्हारी उल्फ़त में मैंने देखा कि कैसे सब कुछ बदल रहा है
शबों की ठंडक सुलग उठी है, दिनों का पारा पिघल रहा है

कभी बहारों से मिलके नाचे, कभी पहाड़ों पे चढ़के बरसे
चुनांचे अपना तमाम क़िस्सा, खुमारियों का शग़ल रहा है

अगर तुम्हारी अदा रही है, कसक दिलों को सदा रही है, 
गुलाब होठों की इक़ छुअन को बदन सर-ओ-पा मचल रहा है

उदासियों के उदास चिहरे, कहीं से फीके, कहीं पे गहरे
न जाने फ़िर क्यूँ, उदासियों का हमारे घर में दख़ल रहा है

सवाल उसके जबाव मेरे, उलझ गया था वहाँ सभी कुछ
वो वक़्त जिसमें विदा लिखी थी, अभी भी दिल में उबल रहा है

बदल तो सकते थे हाल अपने, मगर समय ने दिया न मौका
समय से अपनी निभे भी कैसे, मैं रुक गया तो भी चल रहा है




©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान

 सर्वाधिकार सुरक्षित

शुक्रवार, 14 सितंबर 2018

और अकड़ते देखा तब-तब संसद की दीवारों को


झुलसी मिट्टी, बंजर धरती, सूखे नदी किनारों को
बदला- बदला देख रहा हूँ मौसम के रुखसारों को

ढ़हते घर, टूटे दरवाजे, उजड़े गली- दालानों की
किसने रोक दिया है, गांव के बाहर सभी बहारों को

मेहनतकश को अभी तलक भी मोल नहीं मिल पाया ठीक
क्या माने हम लाल किले की सालाना हुंकारों को

भूख, बेकारी, लाचारी ने, जब भी हक की बात कही
और अकड़ते देखा तब- तब संसद की दीवारों को

इंसानों का भाव नहीं है, काम नहीं है हाथों को, 
आग लगाएँगे क्या ऐसे सजे हुए बाजारों को

बच्चों को नहीं शिक्षा- दीक्षा, दवा नहीं बीमारों को
रेवड़ियाँ बँट रही हैं लेकिन यहाँ इज़ारेदारों को

शोर-शराबा, खून- खराबा, चोरी- हत्या, लूट- डैकत
कैसे कोई पढ़ सकता है, रोज- रोज अखबारों को

पानी बाँटा, माटी बाँटी, धरती को तकसीम किया
कल तुम देखना, बाँटेंगे हम सूरज- चाँद- सितारों को

कुछ चिहरों पर तिलक लगा था, कुछ के सिर पर टोपी थी
अब जाकर पहचाना अल्लाह- ईश्वर के हत्यारों को

नफरत, हिंसा पर झूठे मातम करते नेता से पूछ
किसने इस गुलशन में बाँटा त्रिशूलों, तलवारों को

जाने कैसी आग लगी है, जाने कैसी हवा चली
सुन के परिंदे काँप रहे हैं, हिंदू- मुस्लिम नारों को


©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान

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सोमवार, 27 अगस्त 2018

रुत बदली तो मैंने समझा बदलेंगे हालात मेरे

रुत बदली तो मैंने समझा बदलेंगे हालात मेरे
शायद वो आ जाएंगे, बन जाएंगे औकात मेरे

एक जरा सी बात पे रूठ के राहों से जाने वाले
तू क्या जाने तुझ-बिन कैसे गुजरे हैं दिन-रात मेरे

जीने की भरपूर तलब थी, जीना भी था उसके साथ
मुमकिन है वो जानता था, आँखों में लिखी हर बात मेरे

दोनों ने इकरार किया था, प्यार किया था दोनों ने
उसके हिस्से में गुल आये, आँसू की बरसात मेरे

एक जरा से दिल ने कैसे- कैसे ये तूफान सहे
चाहत, ख्वाहिश, तलब, बेचैनी और रिश्तों की घात मेरे

नाउम्मीदी में ये खुशफहमी भी हरदम साथ रही
मैं जब चाहूँगा रख देंगे वो हाथों में हात मेरे

नदी किनारे से पूछुंगा, क्या आये थे वापिस वो
जिनके पास रखे हैं सारी खुशियों के सौगात मेरे

नाकामी से कुछ सीखा, न किस्मत ने ही साथ दिया
खूब थपेड़े राह में खाये दिल ने यूँ अर्थात मेरे

©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान
 सर्वाधिकार सुरक्षित

शनिवार, 7 जुलाई 2018

किसी ने ख़ाब दिखाये थे रहगुज़र के मुझे



खिले हैं चाँद- सितारे, सलाम कर के मुझे
तिरी निगाह ने देखा, निगाह भर के मुझे

कभी किसी से मुहब्बत जरूर की इसने
तभी तो रात दिखाती है सहर कर के मुझे

बहुत है तेज जमाना भी, जिंदगानी भी,
ऐ ग़म-ए-दिल तू कभी देख तो ठहर के मुझे

किसी भी ठौर न ठहरा, तमाम उम्र चला
किसी ने ख़ाब दिखाये थे रहगुज़र के मुझे

थकी- थकी है सहर, धूप खिल नहीं पाई
बड़ा उदास है सूरज, उदास कर के मुझे

वो मुस्कुरा के नई उलझनों में डाल गया
हिसाब जिससे चुकाने थे उम्र भर के मुझे

©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान
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शुक्रवार, 8 जून 2018

कोई गीत मुहब्बत वाला




कोई गीत मुहब्बत वाला गा सकते तो अच्छा था
जाते- जाते तुम थोड़ा मुस्का सकते तो अच्छा था

जाने कितनी उम्मीदों से तकते हैं दीवाने दिल
तुम भी इन नजरों से नजर मिला सकते तो अच्छा था

चोरी- चोरी रातों मुझसे पूछे उसके बारे में
अपने दिल से कोई बात छुपा सकते तो अच्छा था

जैसे मयख़ाने में भूले जाते हैं शिकवे सारे
हम भी बहके दिल को यूँ बहला सकते तो अच्छा था

वैसे हमको गया निकाला, जैसे जन्नत से आदम
तेरे दर हम लौट अगर फिर आ सकते तो अच्छा था

किसी बात पे बरबस रोते- रोते हँस देते हो ज्यूँ
हम भी दिल को कुछ ऐसा बतला सकते तो अच्छा था

जाने कैसे तुम जख्मों को  हिना बताए बैठे हो
हम भी कोई, दिन को रात बता सकते तो अच्छा था

चाँदी जैसे इस मौसम में निकली सोने जैसी धूप
ऐसे में गर तेरी याद बुझा सकते तो अच्छा था

तेरी यादें फिर- फिर हवा के ताजे झौंकों जैसी हैं
गो इनसे हम दिल के जख्म बचा सकते तो अच्छा था

अक्सर ही पूछा करता हूँ खुदसे, अपना साथी कौन
जुज अपने, तुमको अपना बतला सकते तो अच्छा था

©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान
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गुरुवार, 17 मई 2018

रात दिन हम दिल को समझाते रहे



दर्द हर मौसम में उकसाते रहे
पतझडों के गीत बन गाते रहे

याद में वो झिलमिलाने सा लगा
ख़ाब में भी ख़ाब से आते रहे

एक लंबा सिलसिला था जिंदगी
हम जरा चलने में  घबराते रहे

यूँ तो मुस्तक़बिल खुला था सामने
हम ही पीछे लौट के जाते रहे

आप से मिल तो लिये, फिर उम्र भर
आपको ही हर जगह पाते रहे

उगते सूरज में तुम्हें देखा अगर
शाम ढ़लती में भी तुम आते रहे

इक दिलासा है कि कल के बाद भी
दिन उगेंगे तुम जो मुस्काते रहे

इश्क ने हमको दिया ये रोजगार
रात-दिन हम दिल को समझाते रहे

क्या बला की भीड़ थी उस राह में
जिसपे वो आते रहे, जाते रहे

सोजे- गम का कायदा रखना पड़ा
आह भरने में भी शर्माते रहे

इश्क है बस, अश्क़ तक का इक सफऱ
दिल के अरमाँ आँख तक आते रहे

©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान


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शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

छू के उसने मुझको पत्थर से नगीना कर दिया


आपने क्या खूब मिलने का ये वादा कर दिया
फिर उम्मीदों ने सभी मुर्दों को जिंदा कर दिया

इस मुहब्बत में हमारे गम तो दूने हो गये
और यादों ने तुम्हारी हमको आधा कर दिया

बन हकीकत फिर लिया हूँ, हर नगर, हर- हर गली
हर किसी ने मुझसे बचने का तकाजा कर दिया

सर्दियों में धूप ढ़लते ही हवा के शोर ने
सर्द शामों में छिपाकर और तन्हा कर दिया

हर शज़र पे फूल महकाने का जज़्बा था मगर
सानेहा की पतझडों ने मुझको नंगा कर दिया

चाहतें थीं, उल्फ़तें थीं, रंजिशों ने पर हमें
जिंदगी के वरक पर इक हाशिया सा कर दिया

मैं तो पत्थर था मुहब्बत के नगर की राह का
छू के उसने मुझको पत्थर से नगीना कर दिया

कल जरा सी बात पर रूठा रहा वो रात भर
मुख़्तसर थी वस्ल-ए-शब, उसको भी जाया कर दिया

रोज आलम पूछता था, मुझसे हर गम का सबब
आज इत्मीनान से तेरा खुलासा कर दिया

जो चला इस राह पर उसको फ़ना होना पड़ा
खुद को खोकर पर हक़-ए-उल्फ़त नुमाया कर दिया

आज गम कम था मग़र दिल ने हमेशा की तरह
याद उनको फिर से करने का इरादा कर दिया



©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान


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मंगलवार, 6 फ़रवरी 2018

यूँ तो हर दर्द का बयाँ हम थे



यूँ तो हर दर्द का बयाँ हम थे
बात कुछ थी कि बेजुबाँ हम थे

जो निगाहें हुजूम-ए-यास रहीं
उन निगाहों का तर्जुमाँ हम थे

जब सफ़र में मुक़ाम नज़्र हुआ
सबकी नजरों में राएगाँ हम थे

हासिले-जिंदगी नहीं कुछ भी
दश्त-दर-दश्त इम्तिहाँ हम थे

दौर ऐसे भी दिल पे गुजरे हैं
हर्फ उनके थे औऱ जुबाँ हम थे

कुछ तो मजबूरियाँ भी थीं लेकिन
बेशतर यूँ ही बदगुमां हम थे

चल रही मेरे बाद भी दुनिया
मैंने समझा कि बादबाँ हम थे


©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान
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रविवार, 21 जनवरी 2018

सब आँखों में रहता हूँ मैं



दरियाओं सा बहता हूँ मैं
सब आँखों में रहता हूँ मैं

उजले चिहरे वालों के भी
मुँह पर काला टीका हूँ मैं

कल तक आँखों का तारा था 
अब आँखों का खटका हूँ मैं

सहराओं में जब्त हुआ हूँ
कतरा-कतरा रिसता हूँ मैं

मुझको साया कहनेवालो
हर सूरज का रस्ता हूँ मैं

सूखा हूँ हर गर्मी की रुत
हर बारिश में बरसा हूँ मैं

मुंडेरों पे राह दिखाता
खुद राहों को तरसा हूँ मैं

कुम्हारों के चाक पे घूमा
चाक-दिलों सा तड़पा हूँ मैं

उन के आँखों की खुशियाँ तो
इन के दिल का सदमा हूँ मैं

हाथों से आँखों को ढ़क कर
सहरा-सहरा भटका हूँ मैं

मुझको तन्हाई में सोचो
दिल का इक अफसाना हूँ मैं

बरबस मन में आने वाला
भूला- बिसरा गाना हूँ मैं

अव्वल-अव्वल मैं सब कुछ था
आखिर में बेगाना हूँ मैं

यादों के खँडहर का जैसे
टूटा सा तहखाना हूँ मैं

जाहिल, पागल, जो भी समझो
दीवाना- दीवाना हूँ मैं

खुल कर हँसने की कोशिश में
घुट-घुट बरसों रोया हूँ मैं

दिल को कोई दोष नहीं है
बस नजरों का धोखा हूँ मैं

बाहर जैसा ही दरिया हूँ
भीतर-भीतर बहता हूँ मैं

ग़म को साथी मान लिया है
अब तन्हा नहीं  रहता हूँ मैं



©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान

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शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

नाम रेत पर लिखना लिख के फिर मिटा लेना



मुस्कुरा के रो लेना, रो के मुस्कुरा लेना
आ गया हमें तेरा जिंदगी मजा लेना

ग़म कहीं पे रख देना, डर कहीं पे खो देना
लम्हे सब खुशी के भी वक़्त से चुरा लेना

आ गया हमें भी अब इश्क को ख़ता कहना
खुद ही दिल लगा लेना, खुद सजा उठा लेना

पत्थरों की बस्ती में आरजू है फूलों की
चाहता हूँ आँधी में कुछ दिये जला लेना

कल सभी अकेले थे, आज भी अकेले हैं
गो दीवार में आता खिड़कियाँ बना लेना

भूलने से भी मुश्किल, याद करना भूला कल
नाम रेत पर लिखना, लिख के फिर मिटा लेना


©2017 डॉ रविन्द्र सिंह मान
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