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शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019

गुनाह बाद जो तस्लीम भी करे उसकी


जहाँ तो जान चुका मुझ को तेरी आदत है
कभी तुझे भी बताऊँ कि कैसी चाहत है

मुझी से पूछ रहे हो वफ़ा के अर्थ, कहो
कि इश्क़ तुम जिसे कहते हो क्या सियासत है

किसी ने संग गिराये, ज़हर किसी ने दिया
वो फूल तुमने जो फेंके, वही अदावत है

ख़ुदा ने इश्क़ बनाया, जहाँ ने ज़ख्म दिये
दिलों ने कुफ़्र कमाया, यही बग़ावत है

वो चाहता है, नहीं मानता मग़र फिर भी
यही ज़ुल्मत है वज़ाहत है औ कयामत है

रहे न घर के न बाहर के, दैर के, फिर भी
ये किस तरह से बताते हो सब सलामत है

तुझी से तुझ को चुरालूँ, दिलों में जड़वा लूँ
मैं तुम से पूछ रहा हूँ कि क्या इजाज़त है

गुनाह बाद जो तस्लीम भी करे उसकी
है एक इश्क़ ही, जिसमें कि ये रिवायत है

©2019 डॉ रविन्द्र सिंह मान

रविवार, 15 सितंबर 2019

ऐसे भी बदले की आग बुझाई हमने



ऐसे  भी  बदले की आग  बुझाई हमने
इसकी शामें, उसके साथ बिताई हमने

रिश्ते तोड़ के जब भी चाहो जा सकते हो
तुमको अपनी कसमें  कब दिलवाई हमने

उल्फ़त में भी सब कुछ क़िस्मत से मिलता है
तुमने   दुनिया  पाई  औऱ  तन्हाई  हमने

तेरे ग़म को चुप करवाकर, अपनी आँखें
जाने  किसके  ग़म  में  रात जलाई हमने

सचमुच उसके  बाद  सुकूँ से जीता हूँ मैं
अक़्सर दिल को बात यही समझाई हमने

बहरे सन्नाटे तक  सुन कर  सहम गए थे
तेरी चुप को जब आवाज लगाई हमने

लाख हमारे घर तक दरिया आएं- जाएं
ख़ुद अपने से अपनी प्यास छुपाई हमने



©2019 डॉ रविन्द्र सिंह मान

 सर्वाधिकार सुरक्षित

बुधवार, 21 अगस्त 2019

दुःख तो ये है

दुःख तो ये है वो शामिल हैं मेरा शहर जलाने में
मैंने अपने हाथ जलाए जिनकी आग बुझाने में

यादों को धुँधला करने में, नजरें भी धुंधलाऐंगी,
वक़्त लगेगा दीवारों पर लिक्खे नाम मिटाने में

कुछ कहने से पहले रुककर लाख अगर सोचा फिर भी,
और भी दिल के भेद खुले हैं, दिल का राज छुपाने में

जीवन के शतरंज़ पे आख़िर वक्त ने ऐसी चाल चली
ग़ैर तो  ग़ैर रहे, अपने भी  ग़ैर हुए अनजाने में

कुछ तो उन नीली आँखों में दरियाओं का वादा था
और कुछ लज्ज़त, जिस्मों को भी, डूब के थी मर जाने में

दिल चाहे मंदिर के अंदर खुल जाये इक़ मस्ज़िद भी
और इस मस्ज़िद का इक़ पहलू खुल जाए मयख़ाने में

रोज मरीजों से कहता हूँ ऐसे समझाओ दिल को
लेक़िन ख़ुद को उम्र लगी है, इस दिल को समझाने में

©2019 डॉ रविन्द्र सिंह मान

 सर्वाधिकार सुरक्षित