कोई तो हो
जो झुकते काँधों पे हाथ रख के उदास आँखों का हाल पूछे
जो हँसते चेहरों के पीछे बहते आंसुओं पे सवाल पूछे
उनींदी रातों की अल सुबह ही सियाह धुंध को शफ़्फ़ाक करके
हमारी बेचैन धड़कनों से तमाम वजह ए मलाल पूछे
कोई तो हो
कोई तो हो
जो हमसे पूछे कि कल सुबह तुम क्या कर रहे हो
हमसे पूछे कि अगले हफ़्ते क्या छुट्टियों पे निकल रहे हो?
हमें जताए कि क्या पता क्यूं अब के लीची पे बौर कम है
कहे कि बेमौसम की बारिश से तुम बेवजह ही डर रहे हो
कोई तो हो
कोई तो हो
जो काली रातों का बढ़ना रोके समय का बहता पसीना पोंछे
दिलासा दे जो उदासियों को सूरजों का कुहासा पोंछे
जो तपती राहों में छांव कर दे सब के पैरों के घाव भर दे
तुम्हारी आँखों के डर मिटाए हमारे दिल की निराशा पोंछे
कोई तो हो
©2025 डॉ रविंद्र सिंह मान
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