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सोमवार, 10 सितंबर 2018

जब दिन आता है.......




गरज- बरस करते मेघा, बिजली रह-रह चमकाती है
टप्पर पर गिरती बारिश से आँख नहीं लग पाती है
रात उनींदी थके-पके, क्या- क्या सपने दिखलाती है

सहसा भीतर-भीतर कोई धड़का सा लग जाता है
और डरके जगते ही सामने गर सूरज दिख जाता है
कितनी खुशियाँ लाता है, जब दिन आता है


किसी-किसी दिन साँझों से ही मनहूसी छा जाती है
रात तो जैसे और भी ज्यादा तन्हाई सुलगाती है
कमरे के कोने-कोने में नीरवता झुँझलाती है


खिड़की खोल के रोज सितारों से थोड़ा बतियाता हूँ
जिससे कल बातें की थीं लेकिन जब उसे न पाता हूँ
कहाँ गया वो आज सितारा सबसे पूछना चाहता हूँ


आखिरी पहर तलक भी लेकिन ये तय नहीं हो पाता है
जिससे भी मैं बात करूँ वो ही क्यूँकर खो जाता है
और फिर भीतर का अँधियारा चहुँ ओर इठलाता है

क्या बतलाएँ कैसा गहरा सन्नाटा छा जाता है
पर जब पूर्व आहिस्ता से लाल सुर्ख हो जाता है
कितनी खुशियाँ लाता है, जब दिन आता है


लेकिन जीवन के रस्ते अनिश्चित, अप्रत्याशित हैं
जाने किन बातों से जुगनू रातों में उत्साहित हैं
जाने किस उम्मीद पे आँखें सपनों को लालायित हैं

ऐसे विकट पलों में मन कैसे आशा रख पाता है?
घुप्प अँधेरों में जब-जब कोई दीया जल जाता है
कितनी खुशियाँ लाता है, जब दिन आता है


©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान
 सर्वाधिकार सुरक्षित

शनिवार, 7 जुलाई 2018

किसी ने ख़ाब दिखाये थे रहगुज़र के मुझे



खिले हैं चाँद- सितारे, सलाम कर के मुझे
तिरी निगाह ने देखा, निगाह भर के मुझे

कभी किसी से मुहब्बत जरूर की इसने
तभी तो रात दिखाती है सहर कर के मुझे

बहुत है तेज जमाना भी, जिंदगानी भी,
ऐ ग़म-ए-दिल तू कभी देख तो ठहर के मुझे

किसी भी ठौर न ठहरा, तमाम उम्र चला
किसी ने ख़ाब दिखाये थे रहगुज़र के मुझे

थकी- थकी है सहर, धूप खिल नहीं पाई
बड़ा उदास है सूरज, उदास कर के मुझे

वो मुस्कुरा के नई उलझनों में डाल गया
हिसाब जिससे चुकाने थे उम्र भर के मुझे

©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान
 सर्वाधिकार सुरक्षित

सोमवार, 18 जून 2018

कुछ ऐसे याद आते हो तुम



जब भी शामों को थका- थका सिर पर से सूरज ढलता है
और सँध्या की दस्तक देता जब पच्छम रंग बदलता है
जब- जब बादल के पीछे से पूनम का चाँद निकलता है
तुम फिर से याद आ जाते हो 

धरती की तपन जब रातों की ठंडक में सिहरने लगती है
चँदा से चकोरी मिलने को हर तौर बदलने लगती है
जब रात भी आखिर में रह- रह राहों सी मचलने लगती है
तुम फिर से याद आ जाते हो 

जब शहरों में रहते- रहते, वनवास की बातें होती हैं
तन- मन से भरे खाये- पिये, उपवास की बातें होती हैं
जब हाल से कोई खुश न हो इतिहास की बातें होती हैं
तुम फिर से याद आ जाते हो 

जब रोज दिनों की तह में से, इक दिन तेरे रंग सा चढ़ता है
जब रोज हवा के झुरमट में कोई तेरी खुश्बू भरता है
जब रोज दिशाओं से कोई तेरी ओर इशारा करता है
तुम फिर से याद आ जाते हो 

धरती के दूर किनारे पर, मैं तन्हाईयों से लड़ता हूँ
खुद अपने- आप से डरा- डरा, उन रुसवाईयों से लड़ता हूँ
हर रोज जुदा होकर खुद से, इन परछाईयों से लड़ता हूँ
और याद तुम्हें ही करता हूँ

सुन, आज भी दिल की गलियों में तेरे ही तराने बजते हैं
सुन, आज भी रात की पलकों पर बस खाब तेरे ही सजते हैं
सुन, आज भी, झुककर दीवाने, तेरे नाम पे सज्दे करते हैं
जब-जब भी याद आ जाते हो


©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान
 सर्वाधिकार सुरक्षित

शुक्रवार, 8 जून 2018

कोई गीत मुहब्बत वाला




कोई गीत मुहब्बत वाला गा सकते तो अच्छा था
जाते- जाते तुम थोड़ा मुस्का सकते तो अच्छा था

जाने कितनी उम्मीदों से तकते हैं दीवाने दिल
तुम भी इन नजरों से नजर मिला सकते तो अच्छा था

चोरी- चोरी रातों मुझसे पूछे उसके बारे में
अपने दिल से कोई बात छुपा सकते तो अच्छा था

जैसे मयख़ाने में भूले जाते हैं शिकवे सारे
हम भी बहके दिल को यूँ बहला सकते तो अच्छा था

वैसे हमको गया निकाला, जैसे जन्नत से आदम
तेरे दर हम लौट अगर फिर आ सकते तो अच्छा था

किसी बात पे बरबस रोते- रोते हँस देते हो ज्यूँ
हम भी दिल को कुछ ऐसा बतला सकते तो अच्छा था

जाने कैसे तुम जख्मों को  हिना बताए बैठे हो
हम भी कोई, दिन को रात बता सकते तो अच्छा था

चाँदी जैसे इस मौसम में निकली सोने जैसी धूप
ऐसे में गर तेरी याद बुझा सकते तो अच्छा था

तेरी यादें फिर- फिर हवा के ताजे झौंकों जैसी हैं
गो इनसे हम दिल के जख्म बचा सकते तो अच्छा था

अक्सर ही पूछा करता हूँ खुदसे, अपना साथी कौन
जुज अपने, तुमको अपना बतला सकते तो अच्छा था

©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान
 सर्वाधिकार सुरक्षित

शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

छू के उसने मुझको पत्थर से नगीना कर दिया


आपने क्या खूब मिलने का ये वादा कर दिया
फिर उम्मीदों ने सभी मुर्दों को जिंदा कर दिया

इस मुहब्बत में हमारे गम तो दूने हो गये
और यादों ने तुम्हारी हमको आधा कर दिया

बन हकीकत फिर लिया हूँ, हर नगर, हर- हर गली
हर किसी ने मुझसे बचने का तकाजा कर दिया

सर्दियों में धूप ढ़लते ही हवा के शोर ने
सर्द शामों में छिपाकर और तन्हा कर दिया

हर शज़र पे फूल महकाने का जज़्बा था मगर
सानेहा की पतझडों ने मुझको नंगा कर दिया

चाहतें थीं, उल्फ़तें थीं, रंजिशों ने पर हमें
जिंदगी के वरक पर इक हाशिया सा कर दिया

मैं तो पत्थर था मुहब्बत के नगर की राह का
छू के उसने मुझको पत्थर से नगीना कर दिया

कल जरा सी बात पर रूठा रहा वो रात भर
मुख़्तसर थी वस्ल-ए-शब, उसको भी जाया कर दिया

रोज आलम पूछता था, मुझसे हर गम का सबब
आज इत्मीनान से तेरा खुलासा कर दिया

जो चला इस राह पर उसको फ़ना होना पड़ा
खुद को खोकर पर हक़-ए-उल्फ़त नुमाया कर दिया

आज गम कम था मग़र दिल ने हमेशा की तरह
याद उनको फिर से करने का इरादा कर दिया



©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान


 सर्वाधिकार सुरक्षित

रविवार, 11 फ़रवरी 2018

उल्फ़तों के मारों का दर्द भी न टलता है


गज़ल 


उल्फतों के मारों का दर्द भी न टलता है
चाँदनी के फाहों से रोज घाव जलता है


दिल भी इक जुआरी है, खुद ही दाँव चलता है
और हार के डर से भाग भी निकलता है


हूँ शमा मुहब्बत की, तुम बुझा तो दो, लेकिन
मैं दिया नहीं हूँ जो बुझ के फिर से जलता है


वो उदास शामें फ़िर, घिर के आई हैं दिल में
जिनमें दिल पे खुद का भी कुछ न जोर चलता है


मैं मजे में हूँ तब भी, तुझको याद करता हूँ
याद में तिरी फिर ये, खूब दिल मचलता है


गर पमाइशें दिल की नाप कर बता सकतीं
कौन दिल में रहता है , कौन यूँ उछलता है


 जिंदगी के सहरा में छाँव ढूंढ़ता हूँ मैं
और ख़ाब पेड़ों का साथ-साथ चलता है



©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान

 सर्वाधिकार सुरक्षित

शुक्रवार, 2 फ़रवरी 2018

कोई दिन जब जीने का मन नहीं होता



कोई दिन जब जीने का भी मन नहीं होता
अपनों में भी जैसे अपनापन नहीं होता

रेत के टीले सपनों में रह-रह आते हैं

दश्तों के संगीत ही तब मन को भाते हैं
आँगन में बहते जल बोझल हो जाते हैं
दूर सराबों में ही जब हम खो जाते हैं


रोज ही भाने वाला कोई उपवन नहीं होता

कोई दिन तो जीने का भी मन नहीं होता


चाक-चौबंद किये दामन भी चाक होते हैं

खुशियों के जंगल भी आखिर खाक होते हैं
 यूँ हम इस सूनेपन का  जश्न  मनाते हैं
दीवारों से मिलकर थोड़ा बतियाते हैं

किसी भी सूरत ये सन्नाटा कम नहीं होता

कभी-कभी तो जीने का भी मन नहीं होता


©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान

 सर्वाधिकार सुरक्षित

मंगलवार, 30 जनवरी 2018

कासगंज


कासगंज

आज वतन में हत्यारी  सत्ता फिर से सुशोभित है
कासगंज का जश्न मनाओ, ये उत्सव प्रायोजित है

जिन पेड़ों की शाख कटी है, रोंयेगे वे उम्र तमाम
लेकिन देख रहा हूँ नेताओं के चेहरे पर मुस्कान
भारत माँ की जय बोलेंगे, बस्ती में विष घोलेंगे
टुकड़े- टुकड़े करने की प्रतियोगिता आयोजित है

कासगंज का जश्न मनाओ ये उत्सव प्रायोजित है

सत्ताओं ने सदा ही खेला हत्याओं का खुल्ला खेल
दाँये, बाँये, खादी, भगवा, इनका जनता से क्या मेल
भूख, गरीबी, बेरोजगारी के प्रश्नों से बचने को
हिंदू- मुस्लिम, मंदिर- मस्ज़िद का किस्सा उदघोषित है

कासगंज का जश्न मनाओ, ये उत्सव प्रायोजित है

अफवाहों की तेज हवा ने शोलों को भड़काया है
जो जिंदा हैं उनको भी कल मरा हुआ बतलाया है
झूठ फैला कर, आग लगा कर, खुद ही शोर मचाया है
आज तिरंगा इनके ही कुकर्मों पर खुद क्रोधित है

कासगंज का जश्न मनाओ, ये उत्सव प्रायोजित है



©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान

 सर्वाधिकार सुरक्षित

रविवार, 21 जनवरी 2018

सब आँखों में रहता हूँ मैं



दरियाओं सा बहता हूँ मैं
सब आँखों में रहता हूँ मैं

उजले चिहरे वालों के भी
मुँह पर काला टीका हूँ मैं

कल तक आँखों का तारा था 
अब आँखों का खटका हूँ मैं

सहराओं में जब्त हुआ हूँ
कतरा-कतरा रिसता हूँ मैं

मुझको साया कहनेवालो
हर सूरज का रस्ता हूँ मैं

सूखा हूँ हर गर्मी की रुत
हर बारिश में बरसा हूँ मैं

मुंडेरों पे राह दिखाता
खुद राहों को तरसा हूँ मैं

कुम्हारों के चाक पे घूमा
चाक-दिलों सा तड़पा हूँ मैं

उन के आँखों की खुशियाँ तो
इन के दिल का सदमा हूँ मैं

हाथों से आँखों को ढ़क कर
सहरा-सहरा भटका हूँ मैं

मुझको तन्हाई में सोचो
दिल का इक अफसाना हूँ मैं

बरबस मन में आने वाला
भूला- बिसरा गाना हूँ मैं

अव्वल-अव्वल मैं सब कुछ था
आखिर में बेगाना हूँ मैं

यादों के खँडहर का जैसे
टूटा सा तहखाना हूँ मैं

जाहिल, पागल, जो भी समझो
दीवाना- दीवाना हूँ मैं

खुल कर हँसने की कोशिश में
घुट-घुट बरसों रोया हूँ मैं

दिल को कोई दोष नहीं है
बस नजरों का धोखा हूँ मैं

बाहर जैसा ही दरिया हूँ
भीतर-भीतर बहता हूँ मैं

ग़म को साथी मान लिया है
अब तन्हा नहीं  रहता हूँ मैं



©2018 डॉ रविन्द्र सिंह मान

 सर्वाधिकार सुरक्षित

शनिवार, 30 दिसंबर 2017

पिछले सब दुःख-दर्द भुलादे साल नया



पिछले सब दुःख- दर्द भुलादे साल नया
रोते को इस बार हँसा दे साल नया

आने वाले के मन में सौगातें क्या
दिल का हर इक भेद बतादे साल नया

मासूमों के मुफ़लिस हाथों में फिर से
आटे की चिड़िया पकड़ा दे साल नया

कट्टर इन धर्मों के सर इक बार अगर
फिर सच्च की टोपी पहना दे साल नया

उनसे जोश-खुमारी में जो कर डाले
शायद पूरे करदे वादे साल नया

देख बहारें हम फिर से बेबाक हुये
दिल को फिर से राग बनादे साल नया

मद में डूबे सत्ता के सरदारों को
बेहतर है औकात दिखा दे साल नया

जीवन की शामें ढलती हैं सालों सी
सबको ये अहसास करादे साल नया

दीवानों को और दीवाना कर डाले
माशूकों को आग लगादे साल नया

साथ उठें जो हाथ सभी मजदूरों के
इनको इक हथियार नया दे साल नया


दिसंबर 2015

©2015 डॉ रविन्द्र सिंह मान
 सर्वाधिकार सुरक्षित

सोमवार, 25 दिसंबर 2017

आई रुत फूलों की आई


आई रुत फूलों की आई
प्यार-मुहब्बत वाली धुन
भौंरों ने फिर से गाई
आई रुत फूलों की आई


सर्द हवा जब-जब चलती है
शाम भी यादों सी ढलती है
रात एकाकी मन-मन में
तुमको ही सज्दा करती है


भोर से पहले तक नींदें भी
लेतीं नहीं अंगड़ाई

आई रुत फूलों की आई


कोहरा आँखों का धोखा है
राह ने कब रस्ता रोका है
पत्ता-पत्ता झड़ कर आखिर
फिर से वृक्ष नया होता है

बीते गम को छोड़ के पीछे
खुशियों की राह पाई


आई रुत फूलों की आई


क़िस्मत पे न वश चलता है
अपने हाथ से यश फलता है
हाथों पे धर हाथ जो बैठे
उनका व्यर्थ समय ढ़लता है

पर मिट्टी का मन कब
होने देता ये सुनवाई

आई रुत फूलों की आई


सूरज की गर्माहट वाले
खुश्बू की सी राहत वाले
पतझड़ के पीछे-पीछे
दिन आएँगे चाहत वाले

बेबस मन गलियों- गलियों
क्यूँ देता फिरे दुहाई

आई रुत फूलों की आई


©2017 डॉ रविन्द्र सिंह मान
 सर्वाधिकार सुरक्षित

सोमवार, 18 दिसंबर 2017

याद आये जब बात जरूरी खत लिखना


याद आये जब बात जरूरी खत लिखना
जिस भी बात पे राजी हो सहमत लिखना

ओ मन मेरे मरना तो इक बार ही है
सच न कह पाओ तो गजलें मत लिखना

तारीफें वो शख़्स जो करते हैं मुँह पर
पीठ पे कोशिश करते हैं तोहमत लिखना

लड़ना, लड़ कर हार भी जाना, फिर लड़ना
हार-जीत को ठीक नहीं, किस्मत लिखना

मैं भी चेहरे बदल-बदल के देख चुका
तुम भी नफ़रत को सीखे उल्फत लिखना

हम दिन को भी रात कहेंगे उस खातिर
और भी क्या-क्या है उनकी हसरत लिखना

हर पैरे में लिखते हो मसरूफ़ हो तुम
हर अक्षर में सीखे हो गफ़लत लिखना

सूरज भी जिसके दर सिजदा करता है
हम भी चाहेंगे उसकी अज़मत लिखना

इक अर्से से आईने में मिलने वाला
शख़्स, नहीं सीखा ख़ुद से निस्बत लिखना

©2017 डॉ रविन्द्र सिंह मान
 सर्वाधिकार सुरक्षित

शुक्रवार, 8 दिसंबर 2017

नाम रेत पर लिखना लिख के फिर मिटा लेना



मुस्कुरा के रो लेना, रो के मुस्कुरा लेना
आ गया हमें तेरा जिंदगी मजा लेना

ग़म कहीं पे रख देना, डर कहीं पे खो देना
लम्हे सब खुशी के भी वक़्त से चुरा लेना

आ गया हमें भी अब इश्क को ख़ता कहना
खुद ही दिल लगा लेना, खुद सजा उठा लेना

पत्थरों की बस्ती में आरजू है फूलों की
चाहता हूँ आँधी में कुछ दिये जला लेना

कल सभी अकेले थे, आज भी अकेले हैं
गो दीवार में आता खिड़कियाँ बना लेना

भूलने से भी मुश्किल, याद करना भूला कल
नाम रेत पर लिखना, लिख के फिर मिटा लेना


©2017 डॉ रविन्द्र सिंह मान
 सर्वाधिकार सुरक्षित

मंगलवार, 28 नवंबर 2017

जीवन के बदरंग शहर में गलियों-गलियों फिरता हूँ


जीवन के बदरंग शहर में गलियों-गलियों फिरता हूँ
इसकी-उसकी जाने किसकी याद में आहें भरता हूँ


बचपन वाला इक सूरज, जो चढ़ता रोज उतरता था
सब सपनों के सच्चे होने वाले वादे करता था
सूरज के झूठे वादों ने मुझको बहुत सताया है
पहले-पहल उसी ने मुझको झूठ का पाठ पढ़ाया है

अब छोटी-छोटी बातों पे खुश होने से डरता हूँ
जीवन के बदरंग शहर में गलियों-गलियों फिरता हूँ


कौन लड़कपन में थे दिल में, कौन निगाहे-पैहम थे
दिन भी रोशन, रातें भी उम्मीदों वाले मौसम थे
प्यार के सारे फूल खिले पर काँटों वाले जंगल में
सारे मौसम पतझड़ हो गए आखिर इस काफ़िर दिल में


उम्मीदों के फूलों में मायूसी के रंग भरता हूँ
जीवन के बदरंग शहर में गलियों-गलियों फिरता हूँ


जीने की जिद्द लेकर पहुँचा मैं पुरजोर लड़ाई में
और जवानी सारी बीती लालच की अंगड़ाई में
धन-दौलत, सम्पत्ति, माया के फेरे में जग सारा
प्यार, मुहब्बत, खुशियों का हर गीत फिरे मारा-मारा

इश्क, मुहब्बत, प्यार, वफ़ा की बेजा बातें करता हूँ
जीवन के बदरंग शहर में गलियों-गलियों फिरता हूँ


आने वाले दिन न जाने, और भी क्या दिखलायेंगे
देखे-भाले लोग सभी क्या पत्थर के हो जायेंगे?
नफ़रत माना, खून की भाँति नस-नस में बह जायेगी
इंसानों में, इंसानों सी बात न कुछ रह जायेगी?

भय और संशय में मैं अब साँसें लेते भी डरता हूँ
जीवन के बदरंग शहर में गलियों-गलियों फिरता हूँ

जीवन के बदरंग शहर में गलियों- गलियों फिरता हूँ
इसकी-उसकी जाने किसकी याद में आहें भरता हूँ



©2017 डॉ रविन्द्र सिंह मान
 सर्वाधिकार सुरक्षित

शुक्रवार, 24 नवंबर 2017

सन्नाटों का शोक गीत


कोलाहल थम जाये तो कुछ साँस आये
सन्नाटे ये कहकर, थोड़ा पास आये


बाहर शोर बहुत है
भीतर सन्नाटा है

बाहर का कोई अर्थ नहीं है
भीतर भी तो समर्थ नहीं है

जीवन की राहों के सूनेपन में अब
अँधेरा छा जाये तो कुछ साँस आये


सन्नाटे ये कहकर थोड़ा पास आये
ये कोलाहल थम जाये तो कुछ साँस आये


ठीक पहाड़ के बीच
पहाड़ बना जीवन

पत्थर, मिट्टी, ढ़ेले
कितने शाँत, अकेले!

जीवन के रस्तों की फिसलन पे आखिर
पैर फिसल जाये तो थोड़ा साँस आये


सन्नाटे ये कहकर थोड़ा पास आये
कोलाहल थम जाये तो कुछ साँस आये


साँसों का चलना
भी कोई चलना है

सूरज का ढलना
भी कोई ढलना है

पथ ही पथ की बाधा है
जीवन, मौत का वादा है

धड़कन राहत पाये तो कुछ साँस आये
कोलाहल थम जाये तो कुछ साँस आये


सन्नाटे ये कहकर थोड़ा पास आये
कोलाहल थम जाये तो कुछ साँस आये


©2017 डॉ रविन्द्र सिंह मान
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शनिवार, 4 नवंबर 2017

ठहर ही गईं फिर जमाने की रातें


बहाने बनाकर बुलाने की रातें
कहीं छोड़कर फिर न जाने की रातें

बड़ी मुश्किलों से जरा दिल जो ठहरा
ठहर ही गईं फिर जमाने की रातें

घनी थी सियाही शब-ए-गम की, फिर से
छिड़ी गेसुओं के फ़साने की रातें

बड़ी देर में दिल को राहत मिली थी
लो फिर आ गईं उनके आने की रातें

लगालें गले आप बस दो घड़ी को
नहीं चाहिये गुदगुदाने की रातें

कहाँ तक करें इन दिनों का भरोसा
नहीं अब कहीं आने जाने की रातें

रहे जागते रात भर सब सितारे
तिरी याद के वो जगाने की रातें


©2015 डॉ रविन्द्र सिंह मान
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शुक्रवार, 22 सितंबर 2017

यूँ होता तो कैसा होता


प्यार मुहब्बत सीखा होता
नफ़रत का सर नीचा होता

इसका चिहरा उसका होता
यूँ होता तो कैसा होता

काश वफ़ा का मोती तुमने
दीवानों में ढूंढा होता

मेरे मन से उसके मन को
कोई सीधा रस्ता होता

अगर न झूठी खुशियाँ होतीं
सब आँखों में दरिया होता

पीड़, निराशा, गम तो सब हैं
तू भी होता अच्छा होता

याद तुम्हारी गर आ जाती
मैं मेले में तन्हा होता

बस्ती बस्ती आग लगाकर
खूब ढिंढोरा पीटा होता

न हिंदू कोई मुस्लिम होता
 कोई रोज न झगड़ा होता

इतनी बारिश देने वाले
झौपड़ियों का सोचा होता

©2017 डॉ रविन्द्र सिंह मान
 सर्वाधिकार सुरक्षित

मंगलवार, 18 अक्टूबर 2016

जीतने को जीत का सपना जरूरी है


जीतने को जीत का सपना जरूरी है
जीत पाने के लिये लड़ना जरूरी है

आँसुओं के इस सफर में रोज जीने को
गमज़दा होकर भी पर  हँसना जरूरी है

बंजरों में फूल खिलना हो कठिन चाहे
दिल पे कोई नाम तो लिखना जरूरी है

बात कहनी भी नहीं आती मगर जिनको
बात क्यूँ उनकी पे सिर झुकना जरूरी है

आसमानों से मुझे रिश्ता निभाने को
बारिशों में दिल मिरा बहना जरूरी है

"मान" खुद में बेहतर कुछ ढूँढना है गर
आइने को सामने रखना जरूरी है



©2016 डॉ रविन्द्र सिंह मान
 सर्वाधिकार सुरक्षित

सोमवार, 26 सितंबर 2016

ढूंढा करते हो मंदिर मस्जिद जिसको


चिहरे की ख़ामोशी का मतलब है क्या?
दिल के तूफानों में कुछ गफलत है क्या?

ढूंढ़ा करते हो मंदिर-मस्जिद जिसको 
उसके जैसा ही कोई भीतर है क्या

जब जब उसके होठों अपना नाम सुना
सोचा हमने पाई भी किस्मत है क्या

जिंदा रहने में परेशानी लाख सही
मरने से लेकिन कोई निस्बत है क्या

इक चेहरे पे जाने कितने चेहरे हैं
मौला! इंसानों की ये फितरत है क्या

मेड़ों की खातिर तो खेत से खेत लड़े
खेतों की अब और भी कुछ हसरत है क्या

©2016 डॉ रविन्द्र सिंह मान

 सर्वाधिकार सुरक्षित


शनिवार, 24 सितंबर 2016

राहों में इस उस से धोखा खा बैठे

राहों में इस उस से धोखा खा बैठे
चलते-चलते पत्थर से टकरा बैठे

उनको सिज्दा करके, ऐसा लगता है

दिल का पारा, शीशे में उलझा बैठे

उसने जब भी चाहा रुसवा कर डाला

सीने का गम ये किसको बतला बैठे

वो मौसम से पहले बदला, जिस खातिर

हम जीने-मरने की कसम उठा बैठे

जीवन के दरिया में बहते-बहते सब

साहिल से मिलने की शर्त लगा बैठे



©2016 डॉ रविन्द्र सिंह मान
 सर्वाधिकार सुरक्षित