ग़ज़ल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
ग़ज़ल लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

गुरुवार, 16 नवंबर 2017

फिर तलाशी हो रही है आज बेईमान की


फ़ितरतों में मुस्कुराहट, वुसअतें ईमान की
दिल मुहब्बत से लबालब, जात है इंसान की

दोस्ती के फ़लसफ़े कहते रहे जो उम्र भर
दुश्मनी किरदार में उनके मिली हैवान की

खुद हकीकत ढूंढ़ते-फिरते रहे हैं इस कदर
दूरियाँ नापी हैं हमने दूर तक वीरान की

होश वालों ने पुकारा यार की महफ़िल में कल
मैं खुमारी में मगर डूबा था उस शैतान की

ये गिरह खुलती नहीं है जिंदगी का भेद क्या
बस यहीं से कल्पनायें बन गईं भगवान की

बाद मरने के नहीं जन्नत न कोई दोजखें
बस यही धरती हमारे वास्ते अभिमान की

दोस्तो बचकर! सियासत की बिसातों पे यहाँ
गोटियाँ फेंकी गई हैं बारहा भगवान की

खुद से हो जायें ख़ुदा, अभिमान को करके विदा
बात इतनी सी है गीता या कहें कुरआन की

शुक्रिया दिल से करूँ, या दिल ही कदमों में धरूँ
जान देकर ही उतारूँगा बलाएं जान की

साहिलों तक खींच तो लाये दिलों की डोंगियाँ
डर गया अब देखकर तैयारियां तूफान की

झुरमटों में मिलके उनसे जिंदगी रोशन हुई
जल रही अब तक चिरागे-दिल में लौ अहसान की

नीयतें खंगालते हैं वो हमारी रात-दिन
फिर तलाशी हो रही है आज बेई'मान' की



©2015 डॉ रविन्द्र सिंह मान
 सर्वाधिकार सुरक्षित



सोमवार, 1 जून 2015

ऐ दोस्त! जिंदगी को सजाऊँ कैसे

ऐ दोस्त!  जिंदगी  को  सजाऊँ  कैसे
सख्त हालात हैं, हर बात बताऊँ कैसे?

जा चुके थे तुम अरमान लिये दूर बहुत
मैं सोचता ही रहा तुमको बुलाऊँ कैसे?

चलूँगा चार कदम और बिखर जाऊँगा
मेरा  वजूद  चूर-चूर  उठाऊँ  कैसे?

काँपती है मेरी आवाज गिरते पत्तों सी
ऐसी मुश्किल में तुम्हें साज सुनाऊं कैसे?

हर एक फूल पे पहरा है नजर खुश्बू पे
अब एहतियात से ये चमन जलाऊँ कैसे?

उसने की जब भी किसी से बेवफाई की
अब वो सोचे है जिंदगी से निभाऊँ कैसे?

पिया है  हमने  जहर वक्त के होंठो से
हाँ मैं जिंदा हूँ मगर होश में आऊँ कैसे?

तू जो देखे तो आफताब भी झुकाले नजर
पर मैं  नजरें तेरे  चेहरे से  हटाऊँ  कैसे?

दिया है उसने साथ पिछले मोङ तलक
ये  रहगुजर है  नई  पाँव बढाऊँ कैसे?

वो जतायेंगे अहसान करके कत्ल मेरा
ये दोस्ती है तो ये कर्ज चुकाऊँ कैसे?

शनिवार, 30 मई 2015

दीवानगी

दीवानगी

मेरी दीवानगी का असर देखिये
आज उनके हैं चश्म तर देखिये.

हम थक जायेंगे ये और बात है
अभी मंजिलों का सफर देखिये.

सादा-दिल लुटते हैं सदा के लिये
उनकी सादगी का कहर देखिये.

जम जायेगी तेरी आँखों में नमी
ना मेरा दर्द-ए-जिगर देखिये.

हम दिलजलों को पुकारते हैं दश्त
फिर शाम देखिये न सहर देखिये.

थोङी खुशनुमा थोङी गमगीन
जिंदगी की गुजर बसर देखिये.

चलते-चलते  रुक  गई  है हवा
आप मुङकर जिधर जिधर देखिये.

कितने बहके से हैं दिलों के हालात
जब से आये हैं वो ये शहर देखिये.

था हमें भी यकीं और उन्हें भी गुरूर
आज  किसके हैं  चश्म तर देखिये.

आज उनके हैं चश्म तर देखिये
मेरी दीवानगी का असर देखिये.


©1996 डॉ रविन्द्र सिंह मान
 सर्वाधिकार सुरक्षित

शुक्रवार, 29 मई 2015

मुहब्बत का नहीं तुम्हें यकीं


मेरी मुहब्बत का नहीं तुम्हें  यकीं फिर भी
लौट आया हूँ सारी दुनिया से यहीं फिर भी

साँझ के बाद से चलता हूँ मैं सहर के लिये
तमाम रात तू मिलता  नहीं कहीं फिर भी

है मेरी शक्ल भी और काम भी करता हूँ बहुत
क्यूँ मेरी जात पे जाना है लाजिमी फिर भी?

मेरे  हिस्से में आया  दश्त और यायावरी
तमाम उम्र चले मंजिल मिली नहीं फिर भी

वक्त की राह में तुम छूट गये पर अंत तलक
तेरी  उम्मीद  मेरी हमसफर रही फिर भी

©2015 डॉ रविन्द्र सिंह मान
 सर्वाधिकार सुरक्षित