मंजिलें खोने लगीं अपने निशाँ
फासले बढने लगे हैं दरमियाँ
तुम पुकारोगे भी कैसे प्यार से
बढ गई हैं जिंदगी में तल्खियाँ
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कुछ तो उनकी सोहबत का असर मेरे चेहरे पे है
कुछ हवा के झौंकों की नजर मेरे चेहरे पे है
कुछ तो है कि लौट आया है रुखों पे ओज सा
या गम-ए-हयात की दोपहर मेरे चेहरे पे है.
रविंद्र सिंह मान