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गुरुवार, 4 जून 2015

मंजिलें खोने लगीं अपने निशाँ


मंजिलें खोने लगीं अपने निशाँ
फासले  बढने लगे  हैं दरमियाँ

तुम पुकारोगे  भी कैसे प्यार से
    बढ गई हैं जिंदगी में तल्खियाँ    


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कुछ तो उनकी सोहबत का असर मेरे चेहरे पे है
कुछ  हवा के  झौंकों की  नजर  मेरे  चेहरे पे है

कुछ  तो है कि  लौट आया है  रुखों पे ओज सा
या गम-ए-हयात  की  दोपहर  मेरे  चेहरे पे है.



रविंद्र सिंह मान

शुक्रवार, 29 मई 2015

कुछ शेर

जिंदगी   की  तेज  रफ्तारी  में   बदहवास  सी
मनुजता को अब किसी के दर्द का अहसास नहीं.

सूरज  मुङ  जाता है  छूके  अब उजालों  की  हदें
किरणों को भी अंधेरों में चलने का अभ्यास नहीं

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अब भी  मेरे सीने में  इक  नन्हा  उजला दाग सा है,
बिखर चुके गुलशन के लिये आँखों में इक खाब सा है.

सब दूर पास के लोगों को बाहर से सुनहरा लगता है,
इस मन का घरौंदा अंदर से कोई देखे तो बर्बाद सा है.



रविंद्र  सिंह  मान